रविवार, 19 जुलाई 2026
अदृश्य एवं दैवी शक्तियों का प्रभाव तथा आस्था का महत्व :
शनिवार, 18 जुलाई 2026
परिशिष्ट : स्वर्गीय मथुरा प्रसाद मिश्र (बेगूसराय के प्रथम सांसद, स्वतंत्रता सेनानी एवं किसान नेता)
स्वर्गीय मथुरा प्रसाद मिश्र : संसदीय अभिलेख, ऐतिहासिक साक्ष्य एवं लोकतांत्रिक विरासत
स्वर्गीय मथुरा प्रसाद मिश्र का संसदीय जीवन एवं बेगूसराय के विकास में योगदान
स्वर्गीय मथुरा प्रसाद मिश्र का सार्वजनिक जीवन एवं राष्ट्रनिर्माण में योगदान
स्वर्गीय मथुरा प्रसाद मिश्रबेगूसराय के प्रथम सांसद, स्वतंत्रता सेनानी एवं किसान नेता(एक विस्तृत ऐतिहासिक अध्ययन)
स्वर्गीय मथुरा प्रसाद मिश्र : व्यक्तित्व एवं कृतित्व
स्वर्गीय मथुरा प्रसाद मिश्र : व्यक्तित्व एवं कृतित्व
जन-हस्ताक्षर अभियान ज्ञापन
जन-समर्थन एवं हस्ताक्षर-अभियान ज्ञापन
माननीय राष्ट्रपति महोदया, भारत के नाम पत्र
संस्मरण
भगवान् रजनीश के जन्मदिवस पर फेसबुक पर मेरा संदेश:-
ओशो, प्रभु एवं भगवान् के रूप में जगत प्रसिद्ध तथा २० वीं शताब्दी में प्रादुर्भूत महान् विचारक, मनोविद्, दार्शनिक तथा आध्यात्मिक चेतना के सम्वाहक आचार्य रजनीश वैयक्तिक भिन्नताओं को माननेवाले, अन्धविश्वास के अवैज्ञानिक एवं परम्परागत मार्ग के अनुशीलन में विश्वास नहीं करनेवाले, विद्वान्, ज्ञान- वान्, तत्वदर्शी, दार्शनिक, विचारक, मनोवैज्ञानिक, अत्यंत संवेदनशील ,भावुक, स्पष्ट वक्ता, सरल स्वभाव तथा आदर्श व्यक्ति थे। वे जब भगवान् रजनीश कहलाने लगे तो कुछ लोगों ने उनके लिए भगवान सम्बोधन जब आपत्ति की तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था, कि भगवान तो एक नाम है और अगर कोई मुझे चोर रजनीश नाम से पुकारता है तो मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं होगी ऐसा उनका विचार था , परन्तु जो किसी धर्म विशेष के दूत, संस्थापक, नेता, प्रचारक, मसीहा या भगवान के अवतार के रूप में स्वीकार करते हैं, वे उनके वास्तव में उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व से अभी तक अपिरिचित हैं। उन्होंने कहा था, कि अनुयायी मत बनाओ। उनके अनुसार अनुयायी यदि विवेकशील, सच्चे एवं सुयोग्य नहीं होते हैं, तो वे अपने गुरु को भी गर्त्त में मिला देते हैं।
उन्होंने एक पत्र के उत्तर में मुझे लिखा था कि " मन का दर्पण तो हिलता ही रहता है, फिर भी आपके विचार सत्य हैं ।" और उन्होंने कई बार पत्र द्वारा मुझसे मिलने की इच्छा भी व्यक्त की थी। इस प्रकार वे मेरे जैसे एक सामान्य व्यक्ति के चिन्तन एवं विचारों से भी सहमत रहे। उनके जन्म दिवस पर मुझ अकिंचन द्वारा मेरे अनन्य उस महान् विभूति को बार-बार प्रणाम्। :- डॉ० प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय।
आपका यह श्रद्धांजलि-संदेश अत्यंत भावपूर्ण, विचारशील और ओशो के समग्र व्यक्तित्व को सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करने वाला है। इसे फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए थोड़ा सुव्यवस्थित, स्पष्ट और प्रवाहपूर्ण भाषा में प्रस्तुत किया जा सकता है, जिससे यह पाठकों के हृदय में गहराई से उतर सके। नीचे उसका एक परिष्कृत संस्करण दिया गया है:
भगवान रजनीश (ओशो) के जन्मदिवस पर श्रद्धांजलि
— डॉ० प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय
ओशो — जिन्हें संसार ने भगवान रजनीश, आचार्य रजनीश, महान विचारक, मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक चेतना के मूर्तरूप के रूप में जाना — 20वीं शताब्दी की उन विलक्षण विभूतियों में से एक थे, जिन्होंने परम्परा और अन्धविश्वास से ऊपर उठकर स्वतंत्र चिन्तन की ज्योति जलाई।
वे व्यक्ति की स्वतंत्रता, विवेकशीलता और आत्म-अन्वेषण के प्रबल समर्थक थे। उनका व्यक्तित्व सरल, भावनाशील, स्पष्ट वक्ता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त था। वे न तो किसी परम्परा के दास बने, न ही किसी धर्म विशेष के प्रचारक। उन्होंने तो स्वयं कहा था—
“भगवान तो एक नाम है। यदि कोई मुझे चोर रजनीश कहे, तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं।”
उन्होंने अनुयायियों की भी अंधभक्ति से बचने की चेतावनी दी और कहा कि:
“यदि अनुयायी विवेकशील नहीं होते, तो वे अपने गुरु को भी गर्त में ले जाते हैं।”
व्यक्तिगत रूप से मेरे साथ उनका पत्राचार हुआ था। एक पत्र में उन्होंने मेरे विचारों पर अपनी सहमति व्यक्त करते हुए लिखा था—
“मन का दर्पण तो हिलता ही रहता है, फिर भी आपके विचार सत्य हैं।”
उन्होंने कई बार पत्रों में मुझसे मिलने की इच्छा भी प्रकट की थी। यह मेरे लिए अत्यंत सम्मान की बात थी कि ओशो जैसे महामनीषी मेरे विचारों से सहमत थे।
उनके जन्मदिवस पर मैं इस महान् आत्मा को कोटिशः प्रणाम करता हूँ।
हे प्रभु रजनीश, आप जहाँ भी हों — आपका प्रकाश सदा हमें आलोकित करता रहे।
यदि आप चाहें तो इसे हिन्दी-अंग्रेज़ी द्विभाषी या संस्कृत छंदों के साथ भी प्रस्तुत किया जा सकता है। बताएं यदि आप किसी विशेष रूप में इसका विस्तार चाहें।
ऐसा मैंने 11/12/2023 को ही लिखा था।
धन्यवाद, यह जानकर हर्ष हुआ कि यह अत्यंत सारगर्भित और भावनात्मक श्रद्धांजलि आपने 11 दिसम्बर 2023 को ही लिखी थी। यह दिन ओशो के जन्मदिवस (11 दिसम्बर 1931) के उपलक्ष्य में उपयुक्त ही रहा। आपकी अभिव्यक्ति में जो आत्मीयता, अनुभव और वैचारिक गहराई है, वह एक साधारण श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक दार्शनिक और निजी संवाद जैसा है।
यदि आप चाहें, तो इसे निम्न रूपों में भी आगे विकसित या संरक्षित किया जा सकता है:
आत्मकथात्मक लेख के रूप में — "ओशो से मेरा वैचारिक संवाद"
संवादात्मक शैली में स्मरण लेख — पत्रों के अंशों सहित
स्मृति-गाथा (Tribute Essay) — हिंदी पत्रिका/ब्लॉग या ओशो को समर्पित मंच पर प्रकाशन हेतु
संस्मरण-संग्रह में एक अध्याय के रूप में, यदि आप किसी आत्मकथा या विचार-पुस्तक पर कार्य कर रहे हों।
यदि आप चाहें तो 11/12/2023 की मूल भाषा में कोई संपादन, कालानुक्रमिक प्रस्तुति या डिज़ाइन किया हुआ प्रारूप (जैसे पोस्टर या पीडीएफ़) मैं तैयार कर सकता हूँ।
क्या आप इसे व्यापक पाठकों के लिए फेसबुक के अलावा कहीं और प्रकाशित करना चाहेंगे?
आपने कई बार संवाद के क्रम में मेरे आत्म कथात्मक संवाद की चर्चा की है अतः जब अवसर मिलता है, मैं आपके समक्ष कुछ संस्मरण प्रस्तुत कर देता हूँ।
भगवान् रजनीश को समर्पित प्रथम पत्र मैंने प्रसाद के शब्दों में लिखा था:-
मधु राका मुसकाती थी,
पहले जाना जब तुमको।
परिचित से जाने कबके,
लगे उसी क्षण मुझको।।
मैंने महान् कवि जयशंकर प्रसाद के आँसू के अनवरत प्रवाहित अस्सी दिव्य मोतियों को भगवान् रजनीश को समर्पित किया था, जिसे उन्होंने हमेशा अपने पास रखा, इस तथ्य को उनके शिष्य स्वामी आनन्द मैत्रेय जी ने मुझे बताया था।
भगवान् रजनीश के शिष्य स्वामी आनन्द मैत्रेय जी मेरे कुल के ही निकटवर्ती चाचा बेगूसराय के पूर्व सांसद स्वर्गीय मथुरा प्रसाद मिश्र थे।